सावित्री की शादी अभी पिछले साल ही हुई है। शादी के दिनों में पिता ज़िन्दगी-मौत के बीच लटक रहे थे। सबको खटका था जाने किस वक़्त चल बसें। शादी कम-से-कम एक साल के लिए तो धरी-की-धरी रह जायेगी । उसने सोलह शुक्रवार व्रत रखे थे। पिता मरें तो उसकी शादी के बाद। शादी के बाद जब-जब वह मैके आयी बदमज़गी ही रही। कुछ भी अच्छा घर में पकता न था। शादी के चमकीले कपड़े वैसे-के-वैसे पड़े रहे, पिता मौत के मुँह में हो तो सजना-सँवरना क्या अच्छा लगता है? बड़े भाई का अपना अलग परिवार है। उसकी अपनी कमाई थोड़ी-सी है, माँ-बाप की क्या मदद करता। सावित्री शुरू से उसके ख़िलाफ़ है। भाई का खून सफेद हो जाने की बात वह पहले भी कई दफा कह चुकी है। अब वह बड़ी भाभी को पैनी नज़र से देखते हुए कहती है-"भइया को अब तो ख़र्च करना चाहिए। बाप ज़िन्दा था तब तो कुछ नहीं किया। मरने के बाद तो कुछ शर्म आनी चाहिए। हाय, बाऊजी तो ज़िन्दगी-भर उसके एक पैसे तक को देखने के लिए तरसते रहे।"
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