आखिरी फेरा (Hindi Edition) - Softcover

कुशवाह, संदीप

 
9798232286057: आखिरी फेरा (Hindi Edition)

Synopsis


मैं लेखक इसलिए नहीं बना कि मुझे लिखना आता है बल्कि मैं लेखक इसलिए बना क्योंकि मेरे पास कहने को बहुत कुछ था और सुनने वाला कोई नहीं

मेरी ज़िंदगी में भी एक कहानी थी - अधूरी,उलझी हुई और जरूरत से ज्यादा सच्ची मैंने बहुत कोशिश की कि उसे भूल जाऊँ, लेकिन कुछ यादें भुलने के लिए नहीं होती, वो लिखने के लिए होती है

जब लोग सो जाते है, मैं जागता हूँ क्योंकि रातें मेरे सवालों से नहीं डरती मैं अक्सर प्रेम के बारे में लिखता हूँ क्योंकि मैंने उसे खोया है, मैं दर्द के बारे में लिखता हूँ क्योंकि मैंने उसे जिया है

ये किताब किसी हीरो की नहीं है ये उस इंसान की है जो टूटकर भी खामोश नहीं रहा वो जगह जिसका कोई नाम नहीं है लोग वहा बस इसलिए रुकते हैं क्योंकि कहीं और रुकने की वजह नहीं होती

एक पुरानी सी बेंच थी वहाँ जिसका एक पाया हमेशा हिलता रहता है शाम होते ही धूल और यादें एक साथ जमने लगती हैं

लोग आते हैं, बैठते हैं और चले जाते हैं पर कुछ लोग वहीं रह जाते हैं मैं भी उन्ही में से एक हूँ मैं रोज उसी समय वहाँ आता हूँ जब दिन और रात आपस में झगड़ रहे होते हैं, जब भीड़ कम होती है और खुद से बात करना आसान

उस जगह ने मुझसे कुछ नहीं मांगा - न नाम, न पता, न मेरी कहानी बस मुझे चुपचाप मुझे बैठने दिया कभी - कभी लगता है कि इस जगह को मुझसे ज्यादा पता है कि मैंने क्या खोया है

और शायद मैंने लिखना भी इसिलिए शुरू किया क्योंकि इसने मुझे पहली बार सुन था

मुझे ठीक से याद नहीं कि मैं पहली बार यहाँ क्यूँ आया था बस इतना याद है की उस दिन मेरा मन बहुत भारी था

शाम ढल रही थी, आसमान वैसा ही था जैसा तब होता है जब कुछ कहने को होता है लेकिन शब्द नहीं मिलते

मैं बेंच के उस सिरे पे बैठ था जो हमेशा हिलता रहता है अजीब बात है - वही सिर मुझे पसंद था शायद इसलिए क्योंकि मैं भी अंदर

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