Prashant Singh

शब्दों की शक्ति में अटूट विश्वास रखने वाले प्रशान्त को बचपन से ही कविताएँ व लघु कथाएँ पढ़ने और लिखने का शौक रहा है। कामकाज की व्यस्तता से समय मिलते ही इनके दिलो-दिमाग़ में स्वत: ही कहानियों का जन्म होने लगता है। दिमाग रूपी हार्ड डिस्क ड्राइव में संचित असंख्य गीगाबाइट कल्पनाओं के आधार पर वह अभी तक दो उपन्यास लिख चुके हैं।

वर्तमान में, वह भारत सरकार के संगठन में सहायक महाप्रबंधक के तौर पर कार्यरत हैं। खाली समय मिलने पर उनका शब्दों के प्रति अथाह प्रेम जागृत हो जाता है जब वह साहित्याकाश में चमकती विशिष्ट रचनाओं को पढ़ना पसंद करते हैं।

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प्रकाशित पुस्तकें:

कल्किकाल कथा खण्ड एक – ‘समयान्त रहस्य’

कल्किकाल कथा खण्ड दो – ‘त्रिपुण्ड काक्ष:’

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